समय, क्षीणता और शब्द

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इस माध्यम से ये हिंदी में लेख सभी अनुयाइयों को सादर-समर्पित।

शब्द वास्तव में, किसी भी व्यक्ति के लिए, कई रसों की मिश्रित उत्पत्ति कर सकता है। आज के बहुध्रुवीय कालखंड की जीवंत वास्तविकता में, हम भावोत्पत्ति को तो साध सकते हैं, किंतु वह भावना कितनी तीव्र होगी अपने प्रभाव में या क्षीण होती चले जाएगी, यह साक्ष्य करना स्वतः एक प्रकार की विवेचना है। विवेचना भी किसकी — यह एक उचित प्रश्न है।

चलिए विवेचना की भावांजलि का सार समझते हैं। हो सकता है कि कोई पीढ़ित ही ना हो, किंतु उसके शब्द जब तीव्रता से बिना किसी अनुभूत एवं विकेंद्रित संकुचित होने वाली शाखाओं की बाधाओं से आज यदि विमुख होने लगती है, तब भावोत्पत्ति का इंद्रधनुष, वस्तुतः किसी भी सामान्य व्यक्ति को चकित कर सकता है।

वह उत्पत्ति, हो सकता है उतनी काव्यात्मक ही ना हो, क्योंकि उसे, उन तरीक़ों से पिरोया गया ही ना हो। हो सकता है कुछ शब्द निर्बाध तौर पर, नए रूपों में संरचित हुए हैं, किंतु उनकी जिज्ञासु रचना, उसकी पद्धति, इंगित कर रही हो, कि प्रत्येक भाव-भंगिमा, आपके भूत एवं वर्तमान द्वारा सुव्यक्त एवं स्वचालित नहीं है।

२१वीं शताब्दी का वैश्विक चर्चा परिवेश काफ़ी विचित्र एवं व्यग्र है। आज जो कुंठा, निष्क्रियता एवं चकित होने की स्थिति व्याप्त हुई है, उसकी प्रतिच्छाया स्पष्ट तौर पर इंगित होती दिख रही है। समस्या ये कदापि नहीं होनी चाहिए कि कोई सुधार एवं सरस रहना चाहता है। किंतु, यह स्पष्ट है, कि ये जो इंद्रधनुषी उद्धरण शब्द को एक सुव्यक्त अस्त्र-सा बना देता है, यह रोचक एवं दुखदायी हैं।

किंतु क्या यह सत्य नहीं कि यह जीवन परिमित है? कुछ लोग “ग्रो अप” या “इसका कोई निदान नहीं है” जैसी कुंठित कथनी तो करेंगे ही, क्योंकि वे तो समय की परिसीमा की अप्रत्यक्ष पराकाष्ठा के भी निम्न किसी दैनिक एवं विषय-वस्तु की सीमा के जाल में ही बाध्य (क्षमा चाहूँगा, “व्यस्त”) रहेंगे। हाँ, कुछ सीमाएँ क्षीणता या संकीर्णता को चित्रित नहीं करती, क्योंकि उनका व्याप्त होना एक सामान्य स्थिति की लौकिक पृष्ठभूमि को दर्शाता है।

शब्द-संचार, मानवीय है। विचार एवं भाव की अपनी रसीली महिमा का होना, या जीवंत ही होना, मानवीय है। विश्वास की रचना, स्वचालित होना, कहीं से भी निर्जीव नहीं। मंथन करना मानवीय है, और परिकल्पना कर विचार का विस्तार करना भी मानवीय है।

जीवन भी अनगिनत तौर पर प्राप्त हो, या कभी कभी ना ही हो, किंतु समय के पटल की अटलता, कहीं क्षीण नहीं होगी। यदि भावोत्पत्ति अनायास या अर्धविक्षिप्त-सा लगे, तो शब्दों का क्या ही तर्क है लिपित होने का? यही विडम्बना समय के अरण्य में संवाद एवं सरसता का शोचनीय-सा लगने वाला उन्मूलन करती है।

अंतिम बात यही है कि भाव-शब्द समाज के अनुभव से या प्रवृत्ति के कुपोषित/अनुभवहीन/अपरिचित वास्तविकता से अस्त्र बन जाते हैं। यदि भाव के प्रति, कोई असत-सा विचार करता है, तो कहीं ना कहीं, समय की विशालता को भूल, कुछ लोग संकीर्ण/निम्न जाल में उलझे हुए हैं, क्योंकि रुचि ही नहीं थी, की कदाचित, कुछ उचित भी किया जा सके।

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Host, Indus Think | Founder of Think Tanks & Journals | AI-Global Law Futurist | YouTuber | Views Personal on the Indus Think Blog

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Abhivardhan

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